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नीति आयोग, भारतीय शिक्षण मंडल और LPU द्वारा नेशनल एजुकेशन पालिसी लागू होने में शिक्षक की भूमिका पर वेबिनार आयोजित

इस आयोजन के मुख्य अतिथि पंजाब (बठिंडा) के वाईस चांसलर प्रो आरपी तिवारी थे, और मुख्य वक्ता बीएसएम के राष्ट्रीय संगठन सचिव मुकुल कानितकर थे

शिक्षकों को समय के प्रवाह के अनुसार सदैव अपडेट रहने के लिए लर्निंग, अनलर्निंग और री-लर्निंग का अहम हिस्सा होना चाहिए : वाईस चांसलर, प्रोफेसर आर.पी तिवारी

ब्यूरो : भारतीय शिक्षण मंडल ( बीएसएम) के साथ नीति आयोग ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने में शिक्षक की भूमिका पर एक वेबिनार आयोजित किया, जहाँ लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी ने इसके व्यापक प्रभाव के लिए सहयोग किया। देशभर और अन्य देशों के 2500 से अधिक एलपीयू के फैकल्टी मेंबर्स और विद्यार्थियों ने वेबिनार में भाग लिया, जहां उनमें से 200 की सक्रिय भागीदारी रही। इस आयोजन के मुख्य अतिथि पंजाब विश्वविद्यालय (बठिंडा) के वाईस चांसलर, प्रोफेसर आर पी तिवारी थे और मुख्य वक्ता बीएसएम के राष्ट्रीय संगठन सचिव मुकुल कानितकर थे। एलपीयू के फैकल्टी ऑफ़ बिज़नेस एंड आर्ट्स में कार्यकारी डीन, डॉ. संजय मोदी ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की। विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों के कई अन्य शिक्षाविदों ने भी वेबिनार में भाग लिया। कार्यक्रम का संयोजन प्रो दविंदर सिंह ठाकुर द्वारा किया गया था। वी.सी प्रो तिवारी ने ‘भारत की दार्शनिकता से अपने संबोधन की शुरुआत की जो गुरु की महत्वपूर्ण और सम्मानजनक भूमिका में दृढ़ता से विश्वास रखता है। उन्होंने साझा किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) पहले ही घोषित की जा चुकी है और इसका कार्यान्वयन सभी जिम्मेदार लोगों के आगे एक प्रमुख कार्य है। उन्होंने मुख्य रूप से लर्नर सेंट्रिक एजुकेशन से लेकर लर्निंग सेंट्रिक एजुकेशन में बदलाव की इच्छा की। इस संदर्भ में उनका ध्यान प्राचीन काल में गुरुकुलों के माध्यम से शिक्षा प्रणाली को उजागर करने पर था।
प्रो. तिवारी ने गुरुकुल की ऑटोनोमस प्रकृति को रेखांकित किया जहां गुरुकुल में जो कुछ भी हुआ या लागू किया गया वह गुरु (शिक्षक) की एकमात्र जिम्मेदारी थी। इस संबंध में किसी का भी कोई हस्तक्षेप नहीं था। विज़न, मिशन, पाठ्यक्रम, व्यापक मूल्यांकन प्रणाली, बुनियादी ढाँचा, शिक्षाशास्त्र- आदि सभी एक शिक्षक द्वारा ही बनाए गए थे। उन्होंने विद्यार्थियों के एक समूह को प्रशिक्षित किया जिन्होंने गुरु के मार्गदर्शन में दूसरों को प्रशिक्षित किया। वहाँ शिक्षक का शत-प्रतिशत नियंत्रण हुआ करता था। इस प्रकार, उन्होंने नेशनल एजुकेशन पालिसी के कार्यान्वयन में एक शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया, जो भारत को एक वैश्विक गुरु के प्राचीन गौरव को वापस लाने के लिए उपयुक्त है । उन्होंने शिक्षकों को पूरी भागीदारी और किसी भी मजबूरी के बिना इस पेशे में आगे रहने का आह्वान किया। शिक्षकों को समय के प्रवाह के अनुसार सदैव अपडेट रहने के लिए लर्निंग, अनलर्निंग और री-लर्निंग का अहम हिस्सा होना चाहिए। वी.सी तिवारी ने पश्चिमी देशों की तुलना में नवीनतम शिक्षा कार्यान्वयन में पिछड़ने के बारे में अपनी चिंता भी प्रकट की। हालांकि, वह यह पुष्टि करने में आशावादी थे कि यदि शिक्षक लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो एनईपी का कार्यान्वयन निश्चित रूप से वर्ष 2035 के निर्धारित लक्ष्य से बहुत पहले ही हो जाएगा। उन्होंने यह भी इच्छा प्रकट की कि टीचर्स अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आ कर शिक्षा परिदृश्य में बदलावों को अपनाएं। वी.सी तिवारी से पहले, बीएसएम के राष्ट्रीय संगठन सचिव मुकुल कानितकर ने जोर देकर कहा कि पिछले लगभग 200 वर्षों में देश की शिक्षा नीति के बारे में बहुत कुछ बोला और डॉक्युमेंटेड किया गया है, अब वास्तविक अर्थों में इस नीति को लागू करने का समय आ गया है। एनईपी 2020 की सराहना करते तथा एलपीयू को एक महान अवसर देने के लिए नीति आयोग और बी एस एम के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, डॉ. संजय मोदी ने साझा किया कि शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव लाने के लिए केवल शिक्षक ही महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। प्रतिभागियों में से एक, एलपीयू में इतिहास की प्रोफेसर डॉ प्रिया सेहरावत ने साझा किया कि शिक्षा परिणाम आधारित होनी चाहिए। मात्र डिग्री प्राप्त करने का कोई फायदा नहीं है।